समुद्रने क्षुधा-पिपासाके सहित उदरमें प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न उठा। चन्द्रमाने मनके सहित हृदयमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा॥ ६८॥
क्षुत्तृड्भ्यामुदरं सिन्धुर्नोदतिष्ठत्तदा विराट्।
हृदयं मनसा चन्द्रो नोदतिष्ठत्तदा विराट्॥ ६८
समुद्रने क्षुधा-पिपासाके सहित उदरमें प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न उठा। चन्द्रमाने मनके सहित हृदयमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा॥ ६८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.68 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 369) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/68/