śrotreṇa karṇau ca diśo nodatiṣṭhattadā virāṭ|| 64
अर्थ
सूर्यने चक्षुके सहित नेत्रोंमें प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा। दिशाओंने श्रवणेन्द्रियके सहित कानोंमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा॥ ६४॥
अक्षिणी चक्षुषाऽऽदित्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट्।
श्रोत्रेण कर्णौ च दिशो नोदतिष्ठत्तदा विराट्॥ ६४
सूर्यने चक्षुके सहित नेत्रोंमें प्रवेश किया, तब भी विराट् पुरुष न उठा। दिशाओंने श्रवणेन्द्रियके सहित कानोंमें प्रवेश किया, तो भी विराट् पुरुष न उठा॥ ६४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.64 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 369) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/64/