॥ श्रीहरिः ॥
नाड्योऽस्य निरभिद्यन्त ताभ्यो लोहितमाभृतम्१।
नद्यस्ततः समभवन्नुदरं निरभिद्यत॥ ५९
nāḍyo'sya nirabhidyanta tābhyo lohitamābhṛtam|
nadyastataḥ samabhavannudaraṃ nirabhidyata|| 59
अर्थ
इसी प्रकार जब विराट् पुरुषके नाडियाँ प्रकट हुईं, तो उनसे रुधिर उत्पन्न हुआ और उससे नदियाँ हुईं। फिर उसके उदर (पेट) प्रकट हुआ॥ ५९॥
नाड्योऽस्य निरभिद्यन्त ताभ्यो लोहितमाभृतम्।
नद्यस्ततः समभवन्नुदरं निरभिद्यत॥ ५९
इसी प्रकार जब विराट् पुरुषके नाडियाँ प्रकट हुईं, तो उनसे रुधिर उत्पन्न हुआ और उससे नदियाँ हुईं। फिर उसके उदर (पेट) प्रकट हुआ॥ ५९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.26.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 368) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/26/59/टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—माश्रितम्।
(मुद्रित पृष्ठ 368)