श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.26.1

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

अथ षड्विंशोऽध्यायः

महदादि भिन्‍न-भिन्‍न तत्त्वोंकी उत्पत्तिका वर्णन

श्रीभगवानुवाच

अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि तत्त्वानां लक्षणं पृथक्।

यद्विदित्वा विमुच्येत पुरुषः प्राकृतैर्गुणैः॥ १

atha te sampravakṣyāmi tattvānāṃ lakṣaṇaṃ pṛthak|

yadviditvā vimucyeta puruṣaḥ prākṛtairguṇaiḥ|| 1

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—माताजी! अब मैं तुम्हें प्रकृति आदि सब तत्त्वोंके अलग-अलग लक्षण बतलाता हूँ; इन्हें जानकर मनुष्य प्रकृतिके गुणोंसे मुक्त हो जाता है॥ १॥✎ 317

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #317 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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