श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.44

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां निःश्रेयसोदयः।

तीव्रेण भक्तियोगेन मनो मय्यर्पितं स्थिरम्॥ ४४

etāvāneva loke'smin puṃsāṃ niḥśreyasodayaḥ|

tīvreṇa bhaktiyogena mano mayyarpitaṃ sthiram|| 44

अर्थ

संसारमें मनुष्यके लिये सबसे बड़ी कल्याणप्राप्ति यही है कि उसका चित्त तीव्र भक्तियोगके द्वारा मुझमें लगकर स्थिर हो जाय॥ ४४॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
कापिलेयोपाख्याने पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥

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