श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

देवहूतिरुवाच

काचित्त्वय्युचिता भक्तिः कीदृशी मम गोचरा।

यया पदं ते निर्वाणमंजसान्वाश्नवा अहम्॥ २८

kācittvayyucitā bhaktiḥ kīdṛśī mama gocarā|

yayā padaṃ te nirvāṇamaṃjasānvāśnavā aham|| 28

अर्थ

देवहूतिने कहा—भगवन्! आपकी समुचित भक्तिका स्वरूप क्या है? और मेरी-जैसी अबलाओंके लिये कैसी भक्ति ठीक है, जिससे कि मैं सहजमें ही आपके निर्वाणपदको प्राप्त कर सकूँ?॥ २८॥ निर्वाणस्वरूप प्रभो! जिसके द्वारा तत्त्वज्ञान होता है और जो लक्ष्यको बेधनेवाले बाणके समान भगवान्‌की प्राप्ति करानेवाला है, वह आपका कहा हुआ योग कैसा है और उसके कितने अंग हैं?॥ २९॥ ✎ 313

यह व्याख्या श्लोक 3.25.28 से 3.25.29 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #313 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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