श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

असेवयायं प्रकृतेर्गुणानां

ज्ञानेन वैराग्यविजृम्भितेन।

योगेनमय्यर्पितया च भक्‍त्या

मां प्रत्यगात्मानमिहावरुन्धे॥ २७

asevayāyaṃ prakṛterguṇānāṃ

jñānena vairāgyavijṛmbhitena|

yogenamayyarpitayā ca bhaktyā

māṃ pratyagātmānamihāvarundhe|| 27

अर्थ

इस प्रकार प्रकृतिके गुणोंसे उत्पन्‍न हुए शब्दादि विषयोंका त्याग करनेसे, वैराग्ययुक्त ज्ञानसे, योगसे और मेरे प्रति की हुई सुदृढ़ भक्तिसे मनुष्य मुझ अपने अन्तरात्माको इस देहमें ही प्राप्त कर लेता है॥ २७॥

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