श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.25.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

तं त्वा गताहं शरणं शरण्यं

स्वभृत्यसंसारतरोः कुठारम्।

जिज्ञासयाहं प्रकृतेः पूरुषस्य

नमामि सद्धर्मविदां वरिष्ठम्॥ ११

taṃ tvā gatāhaṃ śaraṇaṃ śaraṇyaṃ

svabhṛtyasaṃsārataroḥ kuṭhāram|

jijñāsayāhaṃ prakṛteḥ pūruṣasya

namāmi saddharmavidāṃ variṣṭham|| 11

अर्थ

आप अपने भक्तोंके संसाररूप वृक्षके लिये कुठारके समान हैं; मैं प्रकृति और पुरुषका ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे आप शरणागतवत्सलकी शरणमें आयी हूँ। आप भागवतधर्म जाननेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं, मैं आपको प्रणाम करती हूँ॥ ११॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें