जो कार्यकारणसे अतीत है, सत्त्वादि गुणोंका प्रकाशक एवं निर्गुण है और अनन्य भक्तिसे ही प्रत्यक्ष होता है उस परब्रह्ममें उन्होंने अपना मन लगा दिया॥ ४३॥✎ 311
मनो ब्रह्मणि युंजानो यत्तत्सदसतः परम्।
गुणावभासे विगुण एकभक्त्यानुभाविते॥ ४३
जो कार्यकारणसे अतीत है, सत्त्वादि गुणोंका प्रकाशक एवं निर्गुण है और अनन्य भक्तिसे ही प्रत्यक्ष होता है उस परब्रह्ममें उन्होंने अपना मन लगा दिया॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.24.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 356) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/24/43/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#311 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्की