वहाँ अहिंसामय संन्यास-धर्मका पालन करते हुए वे एकमात्र श्रीभगवान्की शरण हो गये तथा अग्नि और आश्रमका त्याग करके निःसङ्गभावसे पृथ्वीपर विचरने लगे॥ ४२॥✎ 311
व्रतं स आस्थितो मौनमात्मैकशरणो मुनिः।
निःसंगो व्यचरत्क्षोणीमनग्निरनिकेतनः॥ ४२
वहाँ अहिंसामय संन्यास-धर्मका पालन करते हुए वे एकमात्र श्रीभगवान्की शरण हो गये तथा अग्नि और आश्रमका त्याग करके निःसङ्गभावसे पृथ्वीपर विचरने लगे॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.24.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 356) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/24/42/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#311 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्की