आत्मज्ञानका यह सूक्ष्म मार्ग बहुत समयसे लुप्त हो गया है। इसे फिरसे प्रवर्तित करनेके लिये ही मैंने यह शरीर ग्रहण किया है—ऐसा जानो॥ ३७॥✎ 310
एष आत्मपथोऽव्यक्तो नष्टः कालेन भूयसा।
तं प्रवर्तयितुं देहमिमं विद्धि मया भृतम्॥ ३७
आत्मज्ञानका यह सूक्ष्म मार्ग बहुत समयसे लुप्त हो गया है। इसे फिरसे प्रवर्तित करनेके लिये ही मैंने यह शरीर ग्रहण किया है—ऐसा जानो॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.24.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 355) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/24/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#310 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने