॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.24.18
एष मानवि ते गर्भं प्रविष्टः कैटभार्दनः।
अविद्यासंशयग्रन्थिं छित्त्वा गां विचरिष्यति॥ १८
eṣa mānavi te garbhaṃ praviṣṭaḥ kaiṭabhārdanaḥ|
avidyāsaṃśayagranthiṃ chittvā gāṃ vicariṣyati|| 18
अर्थ
[फिर देवहूतिसे बोले—] राजकुमारी! सुनहरे बाल, कमल-जैसे विशाल नेत्र और कमलांकित चरण-कमलोंवाले शिशुके रूपमें कैटभासुरको मारनेवाले साक्षात् श्रीहरिने ही, ज्ञान-विज्ञानद्वारा कर्मोंकी वासनाओंका मूलोच्छेदन करनेके लिये, तेरे गर्भमें प्रवेश किया है। ये अविद्याजनित मोहकी ग्रन्थियोंको काटकर पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचरेंगे॥ १७-१८॥✎ 309 1596