श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.24.12

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

ब्रह्मोवाच

त्वया मेऽपचितिस्तात कल्पिता निर्व्यलीकतः।

यन्मे संजगृहे वाक्यं भवान्मानद मानयन्॥ १२

tvayā me'pacitistāta kalpitā nirvyalīkataḥ|

yanme saṃjagṛhe vākyaṃ bhavānmānada mānayan|| 12

अर्थ

श्रीब्रह्माजीने कहा—प्रिय कर्दम! तुम दूसरोंको मान देनेवाले हो। तुमने मेरा सम्मान करते हुए जो मेरी आज्ञाका पालन किया है, इससे तुम्हारे द्वारा निष्कपटभावसे मेरी पूजा सम्पन्‍न हुई है॥ १२॥✎ 309 1596

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #309 शब्दोंके बीचका स्थान: बाल,कमल-जैसे → बाल, कमल-जैसे
  • #1596 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निष्कपट-भावसे → निष्कपटभावसे

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