अतः भगवान् जिस कार्यको करना चाहते थे, उसका उन्होंने विशुद्ध चित्तसे अनुमोदन एवं आदर किया और अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे प्रसन्नता प्रकट करते हुए कर्दमजीसे इस प्रकार कहा॥ ११॥
सभाजयन् विशुद्धेन चेतसा तच्चिकीर्षितम्।
प्रहृष्यमाणैरसुभिः कर्दमं चेदमभ्यधात्॥ ११
अतः भगवान् जिस कार्यको करना चाहते थे, उसका उन्होंने विशुद्ध चित्तसे अनुमोदन एवं आदर किया और अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे प्रसन्नता प्रकट करते हुए कर्दमजीसे इस प्रकार कहा॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.24.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 353) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/24/11/