श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.55

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

संगो यः संसृतेर्हेतुरसत्सु विहितोऽधिया।

स एव साधुषु कृतो निःसंगत्वाय कल्पते॥ ५५

saṃgo yaḥ saṃsṛterheturasatsu vihito'dhiyā|

sa eva sādhuṣu kṛto niḥsaṃgatvāya kalpate|| 55

अर्थ

अज्ञानवश असत्पुरुषोंके साथ किया हुआ जो संग संसार-बन्धनका कारण होता है, वही सत्पुरुषोंके साथ किये जानेपर असंगता प्रदान करता है॥ ५५॥

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