अज्ञानवश असत्पुरुषोंके साथ किया हुआ जो संग संसार-बन्धनका कारण होता है, वही सत्पुरुषोंके साथ किये जानेपर असंगता प्रदान करता है॥ ५५॥
संगो यः संसृतेर्हेतुरसत्सु विहितोऽधिया।
स एव साधुषु कृतो निःसंगत्वाय कल्पते॥ ५५
अज्ञानवश असत्पुरुषोंके साथ किया हुआ जो संग संसार-बन्धनका कारण होता है, वही सत्पुरुषोंके साथ किये जानेपर असंगता प्रदान करता है॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 351) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/23/55/