आपके परम प्रभावको न जाननेके कारण ही मैंने इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त रहकर आपसे अनुराग किया तथापि यह भी मेरे संसार-भयको दूर करनेवाला ही होना चाहिये॥ ५४॥
इन्द्रियार्थेषु सज्जन्त्या प्रसंगस्त्वयि मे कृतः।
अजानन्त्या परं भावं तथाप्यस्त्वभयाय मे॥ ५४
आपके परम प्रभावको न जाननेके कारण ही मैंने इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त रहकर आपसे अनुराग किया तथापि यह भी मेरे संसार-भयको दूर करनेवाला ही होना चाहिये॥ ५४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.23.54 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 351) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/23/54/