श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.51

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

देवहूतिरुवाच

सर्वं तद्भगवान्मह्यमुपोवाह प्रतिश्रुतम्।

अथापि मे प्रपन्‍नाया अभयं दातुमर्हसि॥ ५१

sarvaṃ tadbhagavānmahyamupovāha pratiśrutam|

athāpi me prapannāyā abhayaṃ dātumarhasi|| 51

अर्थ

देवहूतिने कहा—भगवन्! आपने जो कुछ प्रतिज्ञा की थी, वह सब तो पूर्णतः निभा दी; तो भी मैं आपकी शरणागत हूँ, अतः आप मुझे अभयदान और दीजिये॥ ५१॥ ब्रह्मन्! इन कन्याओंके लिये योग्य वर खोजने पड़ेंगे और आपके वनको चले जानेके बाद मेरे जन्म-मरणरूप शोकको दूर करनेके लिये भी कोई होना चाहिये॥ ५२॥ प्रभो! अबतक परमात्मासे विमुख रहकर मेरा जो समय इन्द्रियसुख भोगनेमें बीता है, वह तो निरर्थक ही गया॥ ५३॥ आपके परम प्रभावको न जाननेके कारण ही मैंने इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त रहकर आपसे अनुराग किया तथापि यह भी मेरे संसार-भयको दूर करनेवाला ही होना चाहिये॥ ५४॥ अज्ञानवश असत्पुरुषोंके साथ किया हुआ जो संग संसार-बन्धनका कारण होता है, वही सत्पुरुषोंके साथ किये जानेपर असंगता प्रदान करता है॥ ५५॥

यह व्याख्या श्लोक 3.23.51 से 3.23.55 तककी एक साथ है।

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