श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.50

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

लिखन्त्यधोमुखी भूमिं पदा नखमणिश्रिया।

उवाच ललितां वाचं निरुध्याश्रुकलां शनैः॥ ५०

likhantyadhomukhī bhūmiṃ padā nakhamaṇiśriyā|

uvāca lalitāṃ vācaṃ nirudhyāśrukalāṃ śanaiḥ|| 50

अर्थ

इसी समय शुद्ध स्वभाववाली सती देवहूतिने देखा कि पूर्व प्रतिज्ञाके अनुसार उसके पतिदेव संन्यासाश्रम ग्रहण करके वनको जाना चाहते हैं तो उसने अपने आँसुओंको रोककर ऊपरसे मुसकराते हुए व्याकुल एवं संतप्त हृदयसे धीरे-धीरे अति मधुर वाणीमें कहा। उस समय वह सिर नीचा किये हुए अपने नखमणिमण्डित चरणकमलसे पृथ्वीको कुरेद रही थी॥ ४९-५०॥✎ 2000

यह अर्थ श्लोक 49–50 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2000 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): धीर- → धीरे-

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