श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.47

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तस्यामाधत्त रेत१स्तां भावयन्‍नात्मनाऽऽत्मवित्।

नोधा२ विधाय रूपं स्वं सर्वसङ्कल्पविद्विभुः॥ ४७

tasyāmādhatta retastāṃ bhāvayannātmanā''tmavit|

nodhā vidhāya rūpaṃ svaṃ sarvasaṅkalpavidvibhuḥ|| 47

अर्थ

आत्मज्ञानी कर्दमजी सब प्रकारके संकल्पोंको जानते थे; अतः देवहूतिको सन्तानप्राप्तिके लिये उत्सुक देख तथा भगवान्‌के आदेशको स्मरणकर उन्होंने अपने स्वरूपके नौ विभाग किये तथा कन्याओंकी उत्पत्तिके लिये एकाग्रचित्तसे अर्धांगरूपमें अपनी पत्नीकी भावना करते हुए उसके गर्भमें वीर्य स्थापित किया॥ ४७॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—रेतः स्वं।

    (मुद्रित पृष्ठ 351)
  2. २

    प्रा० पा०—नवधा।

    (मुद्रित पृष्ठ 351)

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