श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.23.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

ईदृग्गृहं३ तत्पश्यन्तीं नातिप्रीतेन चेतसा।

सर्वभूताशयाभिज्ञः प्रावोचत्कर्दमः४ स्वयम्॥ २२

īdṛggṛhaṃ tatpaśyantīṃ nātiprītena cetasā|

sarvabhūtāśayābhijñaḥ prāvocatkardamaḥ svayam|| 22

अर्थ

ऐसे सुन्दर घरको भी जब देवहूतिने बहुत प्रसन्‍न चित्तसे नहीं देखा तो सबके आन्तरिक भावको परख लेनेवाले कर्दमजीने स्वयं ही कहा—॥ २२॥ ‘भीरु! तुम इस बिन्दुसरोवरमें स्नान करके विमानपर चढ़ जाओ; यह विष्णुभगवान्‌का रचा हुआ तीर्थ मनुष्योंको सभी कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाला है’॥ २३॥ ✎ 1963

यह व्याख्या श्लोक 3.23.22 से 3.23.23 तककी एक साथ है।

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—इत्‍थं गृहं तस्‍य पश्यन्‍नतिप्रीतेन।

    (मुद्रित पृष्ठ 348)
  2. ४

    प्रा० पा०—प्रोवाच कर्दमः।

    (मुद्रित पृष्ठ 348)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1963 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): कहा— → कहा—॥

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