श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.22.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

कुशकाशमयं बर्हिरास्तीर्य भगवान्मनुः।

अयजद्यज्ञपुरुषं लब्धा स्थानं यतो भुवम्॥ ३१

kuśakāśamayaṃ barhirāstīrya bhagavānmanuḥ|

ayajadyajñapuruṣaṃ labdhā sthānaṃ yato bhuvam|| 31

अर्थ

महाराज मनुने भी श्रीवराहभगवान्‌से भूमिरूप निवासस्थान प्राप्त होनेपर इसी स्थानमें कुश और कासकी बर्हि (चटाई) बिछाकर श्रीयज्ञभगवान्‌की पूजा की थी॥ ३१॥✎ 304 305

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #304 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीयज्ञभगवान् की → श्रीयज्ञभगवान्‌की
  • #305 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीवराहभगवान् से → श्रीवराहभगवान्‌से

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