वे रोम ही निरन्तर हरे-भरे रहनेवाले कुश और कास हुए, जिनके द्वारा मुनियोंने यज्ञमें विघ्न डालनेवाले दैत्योंका तिरस्कार कर भगवान् यज्ञपुरुषकी यज्ञोंद्वारा आराधना की है॥ ३०॥✎ 304305
कुशाः काशास्त एवासन् शश्वद्धरितवर्चसः।
ऋषयो यैः पराभाव्य यज्ञघ्नान् यज्ञमीजिरे॥ ३०
वे रोम ही निरन्तर हरे-भरे रहनेवाले कुश और कास हुए, जिनके द्वारा मुनियोंने यज्ञमें विघ्न डालनेवाले दैत्योंका तिरस्कार कर भगवान् यज्ञपुरुषकी यज्ञोंद्वारा आराधना की है॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.22.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 344) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/22/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#304 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीयज्ञभगवान् की → श्रीयज्ञभगवान्की
#305 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीवराहभगवान् से → श्रीवराहभगवान्से