श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.21.23

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

विदित्वा तव चैत्त्यं मे पुरैव समयोजि तत्।

यदर्थमात्मनियमैस्त्वयैवाहं समर्चितः॥ २३

viditvā tava caittyaṃ me puraiva samayoji tat|

yadarthamātmaniyamaistvayaivāhaṃ samarcitaḥ|| 23

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—जिसके लिये तुमने आत्मसंयमादिके द्वारा मेरी आराधना की है, तुम्हारे हृदयके उस भावको जानकर मैंने पहलेसे ही उसकी व्यवस्था कर दी है॥ २३॥ प्रजापते! मेरी आराधना तो कभी भी निष्फल नहीं होती; फिर जिनका चित्त निरन्तर एकान्तरूपसे मुझमें ही लगा रहता है, उन तुम-जैसे महात्माओंके द्वारा की हुई उपासनाका तो और भी अधिक फल होता है॥ २४॥ प्रसिद्ध यशस्वी सम्राट् स्वायम्भुव मनु ब्रह्मावर्तमें रहकर सात समुद्रवाली सारी पृथ्वीका शासन करते हैं॥ २५॥ विप्रवर! वे परम धर्मज्ञ महाराज महारानी शतरूपाके साथ तुमसे मिलनेके लिये परसों यहाँ आयेंगे॥ २६॥ ✎ 300

यह व्याख्या श्लोक 3.21.23 से 3.21.26 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #300 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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