मैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्की भौंहें प्रणयमुसकानभरी चितवनसे चंचल हो रही थीं, वे गरुड़जीके कंधेपर विराजमान थे। जब कर्दमजीने इस प्रकार निष्कपटभावसे उनकी स्तुति की तब वे उनसे अमृतमयी वाणीसे कहने लगे॥ २२॥✎ 299
इत्यव्यलीकं प्रणुतोऽब्जनाभ-
स्तमाबभाषे वचसामृतेन।
सुपर्णपक्षोपरि रोचमानः
प्रेमस्मितोद्वीक्षणविभ्रमद्भ्रूः॥ २२
मैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्की भौंहें प्रणयमुसकानभरी चितवनसे चंचल हो रही थीं, वे गरुड़जीके कंधेपर विराजमान थे। जब कर्दमजीने इस प्रकार निष्कपटभावसे उनकी स्तुति की तब वे उनसे अमृतमयी वाणीसे कहने लगे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.21.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 337) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/21/22/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)