सूतजीने कहा—मुनिगण! अपनी मायासे वराहरूप धारण करनेवाले श्रीहरिकी रसातलसे पृथ्वीको निकालने और खेलमें ही तिरस्कारपूर्वक हिरण्याक्षको मार डालनेकी लीला सुनकर विदुरजीको बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने मुनिवर मैत्रेयजीसे कहा॥ ८॥
हरेर्धृतक्रोडतनोः स्वमायया
निशम्य गोरुद्धरणं रसातलात्।
लीलां हिरण्याक्षमवज्ञया हतं
संजातहर्षो मुनिमाह भारतः॥ ८
सूतजीने कहा—मुनिगण! अपनी मायासे वराहरूप धारण करनेवाले श्रीहरिकी रसातलसे पृथ्वीको निकालने और खेलमें ही तिरस्कारपूर्वक हिरण्याक्षको मार डालनेकी लीला सुनकर विदुरजीको बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने मुनिवर मैत्रेयजीसे कहा॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 329) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/20/8/