श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.36

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

नैकत्र ते जयति शालिनि पादपद्मं

घ्नन्त्या मुहुः करतलेन पतत्पतंगम्।

मध्यं विषीदति बृहत्स्तनभारभीतं

शान्तेव दृष्टिरमला सुशिखासमूहः॥ ३६

naikatra te jayati śālini pādapadmaṃ

ghnantyā muhuḥ karatalena patatpataṃgam|

madhyaṃ viṣīdati bṛhatstanabhārabhītaṃ

śānteva dṛṣṭiramalā suśikhāsamūhaḥ|| 36

अर्थ

सुन्दरि! जब तुम उछलती हुई गेंदपर अपनी हथेलीकी थपकी मारती हो, तब तुम्हारा चरण-कमल एक जगह नहीं ठहरता; तुम्हारा कटिप्रदेश स्थूल स्तनोंके भारसे थक-सा जाता है और तुम्हारी निर्मल दृष्टिसे भी थकावट झलकने लगती है। अहो! तुम्हारा केशपाश कैसा सुन्दर है’॥ ३६॥

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