(ब्रह्माजीका छोड़ा हुआ वह शरीर एक सुन्दरी स्त्री—संध्यादेवीके रूपमें परिणत हो गया।) उसके चरणकमलोंके पायजेब झंकृत हो रहे थे। उसकी आँखें मतवाली हो रही थीं और कमर करधनीकी लड़ोंसे सुशोभित सजीली साड़ीसे ढकी हुई थी॥ २९॥
तां क्वणच्चरणाम्भोजां मदविह्वललोचनाम्।
कांचीकलापविलसद्दुकूलच्छन्नरोधसम् ॥ २९
(ब्रह्माजीका छोड़ा हुआ वह शरीर एक सुन्दरी स्त्री—संध्यादेवीके रूपमें परिणत हो गया।) उसके चरणकमलोंके पायजेब झंकृत हो रहे थे। उसकी आँखें मतवाली हो रही थीं और कमर करधनीकी लड़ोंसे सुशोभित सजीली साड़ीसे ढकी हुई थी॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 332) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/20/29/