श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

रजःप्रधानान्महतस्त्रिलिंगो दैवचोदितात्।

जातः ससर्ज भूतादिर्वियदादीनि२ पंचशः॥ १३

rajaḥpradhānānmahatastriliṃgo daivacoditāt|

jātaḥ sasarja bhūtādirviyadādīni paṃcaśaḥ|| 13

अर्थ

दैवकी प्रेरणासे रजःप्रधान महत्तत्त्वसे वैकारिक (सात्त्विक), राजस और तामस—तीन प्रकारका अहङ्कार उत्पन्‍न हुआ। उसने आकाशादि पाँच-पाँच तत्त्वोंके अनेक वर्ग* प्रकट किये॥ १३॥✎ 293 294 295

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—भूतानि विय०।

    (मुद्रित पृष्ठ 330)
  2. *

    पंच तन्मात्र, पंच महाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और उनके पाँच-पाँच देवता—इन्हीं छः वर्गोंका यहाँ संकेत समझना चाहिये।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 330)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #293 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #294 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #295 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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