॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.20.1
अथ विंशोऽध्यायः
ब्रह्माजीकी रची हुई अनेक प्रकारकी सृष्टिका वर्णन
शौनक उवाच
महीं प्रतिष्ठाम१ध्यस्य सौते स्वायम्भुवो मनुः।
कान्यन्वतिष्ठद् द्वाराणि मार्गायावरजन्मनाम्॥ १
mahīṃ pratiṣṭhāmadhyasya saute svāyambhuvo manuḥ|
kānyanvatiṣṭhad dvārāṇi mārgāyāvarajanmanām|| 1
अर्थ
शौनकजी कहते हैं—सूतजी! पृथ्वीरूप आधार पाकर स्वायम्भुव मनुने आगे होनेवाली सन्ततिको उत्पन्न करनेके लिये किन-किन उपायोंका अवलम्बन किया?॥ १॥ विदुरजी बड़े ही भगवद्भक्त और भगवान् श्रीकृष्णके अनन्य सुहृद् थे। इसीलिये उन्होंने अपने बड़े भाई धृतराष्ट्रको, उनके पुत्र दुर्योधनके सहित, भगवान् श्रीकृष्णका अनादर करनेके कारण अपराधी समझकर त्याग दिया था॥ २॥ वे महर्षि द्वैपायनके पुत्र थे और महिमामें उनसे किसी प्रकार कम नहीं थे तथा सब प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके आश्रित और कृष्णभक्तोंके अनुगामी थे॥ ३॥ तीर्थसेवनसे उनका अन्तःकरण और भी शुद्ध हो गया था। उन्होंने कुशावर्त्तक्षेत्र (हरिद्वार) में बैठे हुए तत्त्वज्ञानियोंमें श्रेष्ठ मैत्रेयजीके पास जाकर और क्या पूछा?॥ ४॥ सूतजी! उन दोनोंमें वार्तालाप होनेपर श्रीहरिके चरणोंसे सम्बन्ध रखनेवाली बड़ी पवित्र कथाएँ हुई होंगी, जो उन्हीं चरणोंसे निकले हुए गंगाजलके समान सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाली होंगी॥ ५॥ सूतजी! आपका मंगल हो, आप हमें भगवान्की वे पवित्र कथाएँ सुनाइये। प्रभुके उदार चरित्र तो कीर्तन करनेयोग्य होते हैं। भला, ऐसा कौन रसिक होगा जो श्रीहरिके लीलामृतका पान करते-करते तृप्त हो जाय॥ ६॥ ✎ 291
टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—मध्यास्य।