यह चरित्र अत्यन्त पुण्यप्रद परम पवित्र, धन और यशकी प्राप्ति करानेवाला आयुवर्द्धक और कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला तथा युद्धमें प्राण और इन्द्रियोंकी शक्ति बढ़ानेवाला है। जो लोग इसे सुनते हैं, उन्हें अन्तमें श्रीभगवान्का आश्रय प्राप्त होता है॥ ३८॥✎ 289290
एतन्महापुण्यमलं पवित्रं
धन्यं यशस्यं पदमायुराशिषाम्।
प्राणेन्द्रियाणां युधि शौर्यवर्धनं
नारायणोऽन्ते गतिरङ्ग शृण्वताम्॥ ३८
यह चरित्र अत्यन्त पुण्यप्रद परम पवित्र, धन और यशकी प्राप्ति करानेवाला आयुवर्द्धक और कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला तथा युद्धमें प्राण और इन्द्रियोंकी शक्ति बढ़ानेवाला है। जो लोग इसे सुनते हैं, उन्हें अन्तमें श्रीभगवान्का आश्रय प्राप्त होता है॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.19.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 328) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/19/38/