श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

विपन्‍नान् विषपानेन निगृह्य भुजगाधिपम्।

उत्थाप्यापाययद्गावस्तत्तोयं प्रकृतिस्थितम्॥ ३१

vipannān viṣapānena nigṛhya bhujagādhipam|

utthāpyāpāyayadgāvastattoyaṃ prakṛtisthitam|| 31

अर्थ

कालियनागका दमन करके विष मिला हुआ जल पीनेसे मरे हुए ग्वालबालों और गौओंको जीवितकर उन्हें कालियदहका निर्दोष जल पीनेकी सुविधा कर दी॥ ३१॥✎ 197 198 199

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #197 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #198 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #199 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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