जब हिरण्याक्षने देखा कि कमल-दल-लोचन श्रीहरि उसके सामने चक्र लिये खड़े हैं, तब उसकी सारी इन्द्रियाँ क्रोधसे तिलमिला उठीं और वह लम्बी साँसें लेता हुआ अपने दाँतोंसे होठ चबाने लगा॥ ७॥✎ 282283284
स तं निशाम्यात्तरथाङ्गमग्रतो
व्यवस्थितं पद्मपलाशलोचनम्।
विलोक्य चामर्षपरिप्लुतेन्द्रियो
रुषा स्वदन्तच्छदमादशच्छ्वसन्॥ ७
जब हिरण्याक्षने देखा कि कमल-दल-लोचन श्रीहरि उसके सामने चक्र लिये खड़े हैं, तब उसकी सारी इन्द्रियाँ क्रोधसे तिलमिला उठीं और वह लम्बी साँसें लेता हुआ अपने दाँतोंसे होठ चबाने लगा॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.19.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 325) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/19/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#282 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने, → भगवान्ने,
#283 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीवराहभगवान् ने → श्रीवराहभगवान्ने