श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तं व्यग्रचक्रं दितिपुत्राधमेन

स्वपार्षदमुख्येन विषज्जमानम्।

चित्रा वाचोऽतद्विदां खेचराणां

तत्रास्मासन् स्वस्ति तेऽमुं जहीति॥ ६

taṃ vyagracakraṃ ditiputrādhamena

svapārṣadamukhyena viṣajjamānam|

citrā vāco'tadvidāṃ khecarāṇāṃ

tatrāsmāsan svasti te'muṃ jahīti|| 6

अर्थ

चक्र तुरंत ही उपस्थित होकर भगवान्‌के हाथमें घूमने लगा। किंतु वे अपने प्रमुख पार्षद दैत्याधम हिरण्याक्षके साथ विशेषरूपसे क्रीडा करने लगे। उस समय उनके प्रभावको न जाननेवाले देवताओंके ये विचित्र वचन सुनायी देने लगे—‘प्रभो! आपकी जय हो; इसे और न खेलाइये, शीघ्र ही मार डालिये’॥ ६॥ जब हिरण्याक्षने देखा कि कमल-दल-लोचन श्रीहरि उसके सामने चक्र लिये खड़े हैं, तब उसकी सारी इन्द्रियाँ क्रोधसे तिलमिला उठीं और वह लम्बी साँसें लेता हुआ अपने दाँतोंसे होठ चबाने लगा॥ ७॥ उस समय वह तीखी दाढ़ोंवाला दैत्य, अपने नेत्रोंसे इस प्रकार उनकी ओर घूरने लगा मानो वह भगवान्‌को भस्म कर देगा। उसने उछलकर ‘ले, अब तू नहीं बच सकता’ इस प्रकार ललकारते हुए श्रीहरिपर गदासे प्रहार किया॥ ८॥ साधुस्वभाव विदुरजी! यज्ञमूर्ति श्रीवराहभगवान्‌ने शत्रुके देखते-देखते लीलासे ही अपने बायें पैरसे उसकी वह वायुके समान वेगवाली गदा पृथ्वीपर गिरा दी और उससे कहा, ‘अरे दैत्य! तू मुझे जीतना चाहता है, इसलिये अपना शस्त्र उठा ले और एक बार फिर वार कर।’ भगवान्‌के इस प्रकार कहनेपर उसने फिर गदा चलायी और बड़ी भीषण गर्जना करने लगा॥ ९-१०॥ गदाको अपनी ओर आते देखकर भगवान्‌ने, जहाँ खड़े थे वहींसे, उसे आते ही अनायास इस प्रकार पकड़ लिया, जैसे गरुड साँपिनको पकड़ ले॥ ११॥ ✎ 282 283 284

यह व्याख्या श्लोक 3.19.6 से 3.19.11 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #282 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने, → भगवान्‌ने,
  • #283 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीवराहभगवान् ने → श्रीवराहभगवान्‌ने
  • #284 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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