श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

देवा ऊचुः

नमो नमस्तेऽखिलयज्ञतन्तवे

स्थितौ गृहीतामलसत्त्वमूर्तये।

दिष्ट्या हतोऽयं जगतामरुन्तुद-

स्त्वत्पादभक्‍त्या वयमीश निर्वृताः॥ ३०

namo namaste'khilayajñatantave

sthitau gṛhītāmalasattvamūrtaye|

diṣṭyā hato'yaṃ jagatāmaruntuda-

stvatpādabhaktyā vayamīśa nirvṛtāḥ|| 30

अर्थ

देवतालोग कहने लगे—प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है। आप सम्पूर्ण यज्ञोंका विस्तार करनेवाले हैं तथा संसारकी स्थितिके लिये शुद्धसत्त्वमय मंगलविग्रह प्रकट करते हैं। बड़े आनन्दकी बात है कि संसारको कष्ट देनेवाला यह दुष्ट दैत्य मारा गया। अब आपके चरणोंकी भक्तिके प्रभावसे हमें भी सुख-शान्ति मिल गयी॥ ३०॥

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