श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.18.20

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

दैत्यस्य यज्ञावयवस्य माया-

गृहीतवाराहतनोर्महात्मनः ।

कौरव्य मह्यां द्विषतोर्विमर्दनं

दिदृक्षुरागादृषिभिर्वृतः स्वराट्॥ २०

daityasya yajñāvayavasya māyā-

gṛhītavārāhatanormahātmanaḥ |

kauravya mahyāṃ dviṣatorvimardanaṃ

didṛkṣurāgādṛṣibhirvṛtaḥ svarāṭ|| 20

अर्थ

विदुरजी! जब इस प्रकार हिरण्याक्ष और मायासे वराहरूप धारण करनेवाले भगवान् यज्ञमूर्ति पृथ्वीके लिये द्वेष बाँधकर युद्ध करने लगे, तब उसे देखनेके लिये वहाँ ऋषियोंके सहित ब्रह्माजी आये॥ २०॥✎ 279

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #279 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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