॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.18.19
तयोः स्पृधोस्तिग्मगदाहताङ्गयोः
क्षतास्रवघ्राणविवृद्धमन्य्वोः ।
विचित्रमार्गांश्चरतोर्जिगीषया
व्यभादिलायामिव शुष्मिणोर्मृधः॥ १९
tayoḥ spṛdhostigmagadāhatāṅgayoḥ
kṣatāsravaghrāṇavivṛddhamanyvoḥ |
vicitramārgāṃścaratorjigīṣayā
vyabhādilāyāmiva śuṣmiṇormṛdhaḥ|| 19
अर्थ
उस समय उन दोनोंमें ही जीतनेकी होड़ लग गयी, दोनोंके ही अंग गदाओंकी चोटोंसे घायल हो गये थे, अपने अंगोंके घावोंसे बहनेवाले रुधिरकी गन्धसे दोनोंका ही क्रोध बढ़ रहा था और वे दोनों ही तरह-तरहके पैतरे बदल रहे थे। इस प्रकार गौके लिये आपसमें लड़नेवाले दो साँड़ोंके समान उन दोनोंमें एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे बड़ा भयंकर युद्ध हुआ॥ १९॥✎ 279