॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.16.8
नाहं तथाद्मि यजमानहविर्विताने
श्च्योतद्घृतप्लुतमदन् हुतभुङ्मुखेन।
यद्ब्राह्मणस्य मुखतश्चरतोऽनुघासं
तुष्टस्य मय्यवहितैर्निजकर्मपाकैः॥ ८
nāhaṃ tathādmi yajamānahavirvitāne
ścyotadghṛtaplutamadan hutabhuṅmukhena|
yadbrāhmaṇasya mukhataścarato'nughāsaṃ
tuṣṭasya mayyavahitairnijakarmapākaiḥ|| 8
अर्थ
जो अपने सम्पूर्ण कर्मफल मुझे अर्पणकर सदा सन्तुष्ट रहते हैं, वे निष्काम ब्राह्मण ग्रास-ग्रासपर तृप्त होते हुए घीसे तर तरह-तरहके पकवानोंका जब भोजन करते हैं, तब उनके मुखसे मैं जैसा तृप्त होता हूँ वैसा यज्ञमें अग्निरूप मुखसे यजमानकी दी हुई आहुतियोंको ग्रहण करके नहीं होता॥ ८॥✎ 1309