श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

यन्‍नामानि च गृह्णाति लोको भृत्ये कृतागसि।

सोऽसाधुवादस्तत्कीर्तिं हन्ति त्वचमिवामयः॥ ५

yannāmāni ca gṛhṇāti loko bhṛtye kṛtāgasi|

so'sādhuvādastatkīrtiṃ hanti tvacamivāmayaḥ|| 5

अर्थ

सेवकोंके अपराध करनेपर संसार उनके स्वामीका ही नाम लेता है। वह अपयश उसकी कीर्तिको इस प्रकार दूषित कर देता है, जैसे त्वचाको चर्मरोग॥ ५॥✎ 265

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #265 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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