सेवकोंके अपराध करनेपर संसार उनके स्वामीका ही नाम लेता है। वह अपयश उसकी कीर्तिको इस प्रकार दूषित कर देता है, जैसे त्वचाको चर्मरोग॥ ५॥✎ 265
यन्नामानि च गृह्णाति लोको भृत्ये कृतागसि।
सोऽसाधुवादस्तत्कीर्तिं हन्ति त्वचमिवामयः॥ ५
सेवकोंके अपराध करनेपर संसार उनके स्वामीका ही नाम लेता है। वह अपयश उसकी कीर्तिको इस प्रकार दूषित कर देता है, जैसे त्वचाको चर्मरोग॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.16.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 312) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/16/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#265 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने