ब्राह्मण मेरे परम आराध्य हैं; मेरे अनुचरोंके द्वारा आपलोगोंका जो तिरस्कार हुआ है, उसे मैं अपना ही किया हुआ मानता हूँ। इसलिये मैं आपलोगोंसे प्रसन्नताकी भिक्षा माँगता हूँ॥ ४॥✎ 265
तद्वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे।
तद्धीत्यात्मकृतं मन्ये यत्स्वपुम्भिरसत्कृताः॥ ४
ब्राह्मण मेरे परम आराध्य हैं; मेरे अनुचरोंके द्वारा आपलोगोंका जो तिरस्कार हुआ है, उसे मैं अपना ही किया हुआ मानता हूँ। इसलिये मैं आपलोगोंसे प्रसन्नताकी भिक्षा माँगता हूँ॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.16.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 312) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/16/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#265 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने