श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.32

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

द्वाःस्थावादिश्य भगवान् विमानश्रेणिभूषणम्।

सर्वातिशयया लक्ष्म्या जुष्टं स्वं धिष्ण्यमाविशत्॥ ३२

dvāḥsthāvādiśya bhagavān vimānaśreṇibhūṣaṇam|

sarvātiśayayā lakṣmyā juṣṭaṃ svaṃ dhiṣṇyamāviśat|| 32

अर्थ

द्वारपालोंको इस प्रकार आज्ञा दे, भगवान्‌ने विमानोंकी श्रेणियोंसे सुसज्जित अपने सर्वाधिक श्रीसम्पन्‍न धाममें प्रवेश किया॥ ३२॥✎ 270 271

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #270 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #271 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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