द्वारपालोंको इस प्रकार आज्ञा दे, भगवान्ने विमानोंकी श्रेणियोंसे सुसज्जित अपने सर्वाधिक श्रीसम्पन्न धाममें प्रवेश किया॥ ३२॥✎ 270271
द्वाःस्थावादिश्य भगवान् विमानश्रेणिभूषणम्।
सर्वातिशयया लक्ष्म्या जुष्टं स्वं धिष्ण्यमाविशत्॥ ३२
द्वारपालोंको इस प्रकार आज्ञा दे, भगवान्ने विमानोंकी श्रेणियोंसे सुसज्जित अपने सर्वाधिक श्रीसम्पन्न धाममें प्रवेश किया॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.16.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 316) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/16/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)