श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.30

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

एतत्पुरैव निर्दिष्टं रमया क्रुद्धया यदा।

पुरापवारिता द्वारि विशन्ती मय्युपारते॥ ३०

etatpuraiva nirdiṣṭaṃ ramayā kruddhayā yadā|

purāpavāritā dvāri viśantī mayyupārate|| 30

अर्थ

एक बार जब मैं योगनिद्रामें स्थित हो गया था, तब तुमने द्वारमें प्रवेश करती हुई लक्ष्मीजीको रोका था। उस समय उन्होंने क्रुद्ध होकर पहले ही तुम्हें यह शाप दे दिया था॥ ३०॥✎ 270 271

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #270 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #271 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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