श्रीभगवान्ने कहा—मुनिगण! आपने इन्हें जो शाप दिया है—सच जानिये, वह मेरी ही प्रेरणासे हुआ है। अब ये शीघ्र ही दैत्ययोनिको प्राप्त होंगे और वहाँ क्रोधावेशसे बढ़ी हुई एकाग्रताके कारण सुदृढ़ योगसम्पन्न होकर फिर जल्दी ही मेरे पास लौट आयेंगे॥ २६॥✎ 269
एतौ सुरेतरगतिं प्रतिपद्य सद्यः
संरम्भसम्भृतसमाध्यनुबद्धयोगौ ।
भूयः सकाशमुपयास्यत आशु यो वः
शापो मयैव निमितस्तदवैत विप्राः॥ २६
श्रीभगवान्ने कहा—मुनिगण! आपने इन्हें जो शाप दिया है—सच जानिये, वह मेरी ही प्रेरणासे हुआ है। अब ये शीघ्र ही दैत्ययोनिको प्राप्त होंगे और वहाँ क्रोधावेशसे बढ़ी हुई एकाग्रताके कारण सुदृढ़ योगसम्पन्न होकर फिर जल्दी ही मेरे पास लौट आयेंगे॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.16.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 316) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/16/26/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—निहित०।
(मुद्रित पृष्ठ 316)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#269 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने