जिस समय सनकादि मुनि विश्वगुरु श्रीहरिके निवास-स्थान, सम्पूर्ण लोकोंके वन्दनीय और श्रेष्ठ देवताओंके विचित्र विमानोंसे विभूषित उस परम दिव्य और अद्भुत वैकुण्ठधाममें अपने योगबलसे पहुँचे, तब उन्हें बड़ा ही आनन्द हुआ॥ २६॥✎ 26126213071308
तद्विश्वगुर्वधिकृतं भुवनैकवन्द्यं
दिव्यं विचित्रविबुधाग्र्यविमानशोचिः।
आपुः परां मुदमपूर्वमुपेत्य योग-
मायाबलेन मुनयस्तदथो विकुण्ठम्॥ २६
जिस समय सनकादि मुनि विश्वगुरु श्रीहरिके निवास-स्थान, सम्पूर्ण लोकोंके वन्दनीय और श्रेष्ठ देवताओंके विचित्र विमानोंसे विभूषित उस परम दिव्य और अद्भुत वैकुण्ठधाममें अपने योगबलसे पहुँचे, तब उन्हें बड़ा ही आनन्द हुआ॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.15.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 307) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/15/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)