श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.23

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यन्‍न व्रजन्त्यघभिदो रचनानुवादा-

च्छृण्वन्ति येऽन्यविषयाः कुकथा मतिघ्नीः।

यास्तु श्रुता हतभगैर्नृभिरात्तसारा१-

स्तांस्तान् क्षिपन्त्यशरणेषु तमःसु हन्त॥ २३

yanna vrajantyaghabhido racanānuvādā-

cchṛṇvanti ye'nyaviṣayāḥ kukathā matighnīḥ|

yāstu śrutā hatabhagairnṛbhirāttasārā-

stāṃstān kṣipantyaśaraṇeṣu tamaḥsu hanta|| 23

अर्थ

जो लोग भगवान्‌की पापापहारिणी लीलाकथाओंको छोड़कर बुद्धिको नष्ट करनेवाली अर्थ-कामसम्बन्धिनी अन्य निन्दित कथाएँ सुनते हैं, वे उस वैकुण्ठलोकमें नहीं जा सकते। हाय! जब वे अभागे लोग इन सारहीन बातोंको सुनते हैं, तब ये उनके पुण्योंको नष्टकर उन्हें आश्रयहीन घोर नरकोंमें डाल देती हैं॥ २३॥✎ 261 262 1307 1308

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—त्तवीर्यां।

    (मुद्रित पृष्ठ 307)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #261 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #262 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1307 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वैकुण्ठ-लोकमें → वैकुण्ठलोकमें
  • #1308 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रति-बिम्ब → प्रतिबिम्ब

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