देव! आग जिस प्रकार ईंधनमें पड़कर बढ़ती रहती है, उसी प्रकार कश्यपजीके वीर्यसे स्थापित हुआ यह दितिका गर्भ सारी दिशाओंको अन्धकारमय करता हुआ क्रमशः बढ़ रहा है॥ १०॥
एष देव दितेर्गर्भ ओजः काश्यपमर्पितम्।
दिशस्तिमिरयन् सर्वा वर्धतेऽग्निरिवैधसि॥ १०
देव! आग जिस प्रकार ईंधनमें पड़कर बढ़ती रहती है, उसी प्रकार कश्यपजीके वीर्यसे स्थापित हुआ यह दितिका गर्भ सारी दिशाओंको अन्धकारमय करता हुआ क्रमशः बढ़ रहा है॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.15.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 305) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/15/10/