श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.1

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

अथ पञ्चदशोऽध्यायः

जय-विजयको सनकादिका शाप

मैत्रेय उवाच

प्राजापत्यं तु तत्तेजः परतेजोहनं दितिः।

दधार वर्षाणि शतं शङ्कमाना सुरार्दनात्॥ १

prājāpatyaṃ tu tattejaḥ paratejohanaṃ ditiḥ|

dadhāra varṣāṇi śataṃ śaṅkamānā surārdanāt|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! दितिको अपने पुत्रोंसे देवताओंको कष्ट पहुँचनेकी आशंका थी, इसलिये उसने दूसरोंके तेजका नाश करनेवाले उस कश्यपजीके तेज (वीर्य)-को सौ वर्षोंतक अपने उदरमें ही रखा॥ १॥

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