जिनकी कृपासे उन्हींका स्वरूपभूत यह जगत् आनन्दित होता है, वे स्वयंप्रकाश भगवान् भी उसकी अनन्यभक्तिसे सन्तुष्ट हो जायँगे॥ ४६॥✎ 260
यत्प्रसादादिदं विश्वं प्रसीदति यदात्मकम्।
स स्वदृग्भगवान् यस्य तोष्यतेऽनन्यया दृशा॥ ४६
जिनकी कृपासे उन्हींका स्वरूपभूत यह जगत् आनन्दित होता है, वे स्वयंप्रकाश भगवान् भी उसकी अनन्यभक्तिसे सन्तुष्ट हो जायँगे॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 303) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/14/46/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#260 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को