श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.46

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यत्प्रसादादिदं विश्‍वं प्रसीदति यदात्मकम्।

स स्वदृग्भगवान् यस्य तोष्यतेऽनन्यया दृशा॥ ४६

yatprasādādidaṃ viśvaṃ prasīdati yadātmakam|

sa svadṛgbhagavān yasya toṣyate'nanyayā dṛśā|| 46

अर्थ

जिनकी कृपासे उन्हींका स्वरूपभूत यह जगत् आनन्दित होता है, वे स्वयंप्रकाश भगवान् भी उसकी अनन्यभक्तिसे सन्तुष्ट हो जायँगे॥ ४६॥✎ 260

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #260 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को

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