श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.45

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

योगैर्हेमेव दुर्वर्णं भावयिष्यन्ति साधवः।

निर्वैरादिभिरात्मानं यच्छीलमनुवर्तितुम्॥ ४५

yogairhemeva durvarṇaṃ bhāvayiṣyanti sādhavaḥ|

nirvairādibhirātmānaṃ yacchīlamanuvartitum|| 45

अर्थ

जिस प्रकार खोटे सोनेको बार-बार तपाकर शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार साधुजन उसके स्वभावका अनुकरण करनेके लिये निर्वैरता आदि उपायोंसे अपने अन्तःकरणको शुद्ध करेंगे॥ ४५॥✎ 260

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #260 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को

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