श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

न यस्य लोके स्वजनः परो वा

नात्यादृतो नोत कश्चिद्विगर्ह्यः।

वयं व्रतैर्यच्चरणापविद्धा-

माशास्महेऽजां बत भुक्तभोगाम्॥ २५

na yasya loke svajanaḥ paro vā

nātyādṛto nota kaścidvigarhyaḥ|

vayaṃ vratairyaccaraṇāpaviddhā-

māśāsmahe'jāṃ bata bhuktabhogām|| 25

अर्थ

संसारमें उनका कोई अपना या पराया नहीं है। न कोई अधिक आदरणीय और न निन्दनीय ही है। हमलोग तो अनेक प्रकारके व्रतोंका पालन करके उनकी मायाको ही ग्रहण करना चाहते हैं, जिसे उन्होंने भोगकर लात मार दी है॥ २५॥

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