अप्यायुषा वा कार्त्स्न्येन ये चान्ये गुणगृध्नवः॥ २०
na vayaṃ prabhavastāṃ tvāmanukartuṃ gṛheśvari|
apyāyuṣā vā kārtsnyena ye cānye guṇagṛdhnavaḥ|| 20
अर्थ
गृहेश्वरि! तुम-जैसी भार्याके उपकारोंका बदला तो हम अथवा और कोई भी गुणग्राही पुरुष अपनी सारी उम्रमें अथवा जन्मान्तरमें भी पूर्णरूपसे नहीं चुका सकते॥ २०॥
न वयं प्रभवस्तां त्वामनुकर्तुं गृहेश्वरि।
अप्यायुषा वा कार्त्स्न्येन ये चान्ये गुणगृध्नवः॥ २०
गृहेश्वरि! तुम-जैसी भार्याके उपकारोंका बदला तो हम अथवा और कोई भी गुणग्राही पुरुष अपनी सारी उम्रमें अथवा जन्मान्तरमें भी पूर्णरूपसे नहीं चुका सकते॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 300) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/14/20/